
कार की खिड़की से बाहर ढलती शाम का मंज़र धीरे-धीरे गहरे अंधेरे में बदल रहा था। आध्या कार की पिछली सीट पर गुमसुम बैठी थी। उसका एक हाथ अब भी अपने खाली पेट पर टिका हुआ था, और आँखें बाहर तेज़ी से पीछे छूटते रास्तों पर टिकी थीं।
"हमे तो यह भी नहीं मालूम कि तकदीर हमे किस मोड़ पर ले आई है..." आध्या ने मन ही मन सोचा।


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